आत्मा से प्रार्थना करें।
परमेश्वर का वचन 1 थिस्सलुनीकियों 5:23 और इब्रानियों 4:11-13 में कहता है... हम आत्मा, प्राण और शरीर हैं। उद्धार के समय आत्मा रिजनरेटिव किया जाता हे और पवित्र आत्मा वहाँ रहता है, लेकिन प्राण - सोल (हमारा मन, इच्छा और भावनाएँ) माँ के गर्भ से लेकर उद्धार के दिन तक और उसके बाद भी बहुत सी गलत और पापी चीजें सीखता है, जिन्हें क्रूस पर चढ़ाने की ज़रूरत होती है (इफिसियों 2:20)।
हम प्रार्थना करते हैं और कभी-कभी हमारी प्रार्थनाएँ हमारी प्राण - सोल ( हमारे मन, इच्छा ओर भावनाओं) द्वारा हमारी अपनी स्वार्थी इच्छाओं के आधार पर की जाती हैं। हम यह सोचकर प्रार्थना करते हैं कि परमेश्वर वैसे ही काम करेगा जैसे हम प्रार्थना करते हैं, इच्छा करते हैं और माँगते हैं। ये प्रार्थनाएँ हमारी प्राण ( मन इच्छाशक्ति और भावनाओं) द्वारा संचालित होती हैं।
जबकि आत्मिक प्रार्थनाएँ वे होती हैं हमारा प्राण (मन, इच्छा और भावनाएँ) पवित्र आत्मा द्वारा परमेश्वर के वचन के अनुसार निर्देशित होता हैं ओर हमारी मन इच्छा शक्ति के आधार पे नहीं. परमेश्वर ऐसी प्रार्थना का उत्तर देता है।
जबकि प्राण ( मन इच्छा शक्ति ओर भावनाओं ) के माध्यम से की गई प्रार्थनाओं के मामले में, प्रार्थना करते समय हमारी आत्मा को बेहतर महसूस होगा, लेकिन उसके बाद फिर से हमारे अंदर कुछ खालीपन महसूस होगा। हम थका हुआ, सूखा और कुछ कमी महसूस करेंगे। यदि हमारे मन, इच्छा और भावनाओं की स्थिति वैसी ही है जैसी उद्धार से पहले थी, यानी हम वही गुस्सा, चोट, नफरत, कड़वाहट और पसंद या नापसंद लेकर चल रहे हैं, तो हम शरीर में चल रहे हैं और हमने अपने आत्मिक जीवन को क्रूस पर नहीं चढ़ाया है।
हर दिन हमें अपना क्रूस उठाना है और उन इच्छाओं / भावनाओं को मारना है जो परमेश्वर के वचन के अनुसार नहीं हैं। हमारी प्राण ( मन इच्छाशक्ति और भावनाओं) सांसारिक ओर शारीरिक विचार विचारों का जो उसमें गढ़ बना के बैठे हे, का शोर होता हे बो गायब हो जाएगा और हम आत्मा में चलना शुरू कर देंगे...
परमेश्व आप को आशीष दे!
पा. रमेश सी. कौंडल
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