कलीसिया की शुरुआत एकता में हुई

 1. शिक्षा का विषय: एकता की ओर लौटना,  इस शिक्षा का शीर्षक है एकता की ओर लौटना। जिस एकता की मैं बात कर रहा हूँ वह मसीह की देह की एकता हैयानी पृथ्वी पर यीशु मसीह की कलीसिया की एकता। इसका संबंध किसी विशेष संप्रदाय, किसी विशेष नाम या लेबल से नहीं है, बल्कि उन सभी लोगों से है जिन्होंने सच में यीशु को अपना उद्धारकर्ता और प्रभु मान लिया है और उसके अनुसार जीवन जीने और उसकी इच्छा पूरी करने का प्रयास कर रहे हैं। कोई भी संप्रदाय, राष्ट्रीयता या सांस्कृतिक पृष्ठभूमि महत्वपूर्ण नहीं है।

 यीशु की दृष्टि में पृथ्वी पर केवल एक ही कलीसिया है। यह तो कैथोलिक कलीसिया है, प्रोटेस्टेंट कलीसिया, बैपटिस्ट, प्रेस्बिटेरियन और ही एंग्लिकन कलीसियायह उसकी कलीसिया है। और मेरा विश्वास है कि वह इस बात को लेकर बहुत गंभीर है कि यह केवल उसी की कलीसिया हो। हम अक्सर कहते हैं मेरी कलीसिया। लेकिन एक दिन प्रभु ने मुझसे कहा, “क्या तुम मुझे बता सकते हो कि वास्तव में यह कलीसिया किसकी है?” मुझे रुककर सोचना पड़ा और मैंने कहा, “प्रभु, मैं आशा करता हूँ कि यह आपकी कलीसिया है, लेकिन मुझे पूरी तरह निश्चित नहीं है।उस अनुभव ने मुझे यह समझा दिया कि मैं यीशु मसीह की कलीसिया के किसी भी भाग पर अपना लेबल या स्वामित्व लगाने का प्रयास करूँ। मैं एकता की ओर लौटने की बात इसलिए करता हूँ क्योंकि प्रेरितों के काम की पुस्तक के विवरण से यह बिल्कुल स्पष्ट है कि कलीसिया की शुरुआत एकता में हुई थी।

 यदि हम पृथ्वी पर कलीसिया के जन्म की ओर देखें, जो प्रेरितों के काम 2:1 में वर्णित है, तो वहाँ लिखा है:

जब पिन्तेकुस्त का दिन पूरा हुआ, तो वे सब एक मन होकर एक ही स्थान में इकट्ठे थे।वे एकता में थे।

इसके बाद उसी अध्याय में, जब पवित्र आत्मा उतरा और बहुत से लोग विश्वास में आए, तो प्रेरितों के काम 2:44–47 में लिखा है: “जो विश्वास करते थे वे सब एक साथ रहते थे और सब वस्तुएँ साझे में रखते थे। वे अपनी संपत्ति और सामान बेचकर सब में बाँट देते थे, जैसा किसी को आवश्यकता होती थी। वे प्रतिदिन एक मन होकर मंदिर में इकट्ठे होते थे और घर-घर रोटी तोड़ते थे और आनन्द और सरल मन से भोजन करते थे...” ध्यान देंवे एक मन थे। वे सब एक साथ थे।

इसी प्रकार कलीसिया का जन्म हुआ। और प्रेरितों के काम 4:32 में आगे लिखा है: “विश्वास करने वालों की भीड़ एक मन और एक प्राण थी; और कोई भी अपनी संपत्ति को अपना नहीं कहता था, परन्तु सब वस्तुएँ उनकी साझी थीं।यह बहुत स्पष्ट है कि वे एक ही शरीर, एक ही समूह थे। यदि आप पौलुस की पत्रियों के बारे में सोचेंजैसे उसने कुरिन्थ की कलीसिया, थिस्सलुनीके की कलीसिया, या फिलिप्पी की  कलीसिया को लिखातो उसने कभीकुरिन्थ की बैपटिस्ट कलीसियायाएंग्लिकन कलीसियायाकैथोलिक कलीसियाको नहीं लिखा। वहाँ केवल एक कलीसिया थी।

 एक रोचक प्रश्न यह हो सकता है: यदि पौलुस आज जीवित होता और सिंगापुर की कलीसिया को पत्र लिखता, तो वह किसे दिया जाता? मैं यह इसलिए कह रहा हूँ ताकि हम समझ सकें कि हम उस मूल नमूने से कितनी दूर चले गए हैं जिस पर कलीसिया की स्थापना हुई थी। मैं आपको दोषी महसूस कराने की कोशिश नहीं कर रहा हूँ और ही स्वयं को दोषी ठहराने की। हम सदियों के इतिहास के लिए जिम्मेदार नहीं हैं। हम उसके परिणामों को झेल सकते हैं, लेकिन हम अपने कार्यों और आज की परिस्थिति में अपनी प्रतिक्रिया के लिए जिम्मेदार हैं।

एक बात स्पष्ट है: जब यीशु वापस आएगा, तो वह एक संयुक्त कलीसिया के लिए आएगा क्योंकि वह एक दुल्हन के लिए रहा है। कलीसिया उसकी दुल्हन है। यीशु कोई बहुविवाही नहीं है। उसकी दो दुल्हनें नहीं हैंएक एंग्लिकन दुल्हन, एक प्रोटेस्टेंट दुल्हन आदि। किसी किसी तरह, अभी और उसके आने के बीच, कलीसिया को उस समूह के रूप में पहचाना जाना होगा जो मिलकर मसीह की दुल्हन बनेगा। शायद यह असंभव या अवास्तविक लगे। लेकिन यीशु ने कहा: “मनुष्यों से यह असंभव है, परन्तु परमेश्वर से सब कुछ संभव है।मेरा विश्वास है कि यदि परमेश्वर ने कहा है कि वह कुछ करेगा, तो वह अवश्य करेगा।

 प्रेरितों के काम अध्याय 3 में एक महत्वपूर्ण प्रकाशन यह है कि वर्तमान युग का अंत सब बातों की  पुनर्स्थापना के समय से होगा। पुनर्स्थापना का अर्थ हैचीजों को फिर से सही स्थान और सही स्थिति में लाना। परमेश्वर अपने लोगों के साथ यही करने जा रहा है। पुराने नियम की भविष्यवाणी के अनुसार, परमेश्वर के पास एक वाचा-प्रजा है जिसे इस्राएल कहा जाता है, जिसे वह कभी नहीं छोड़ेगा। सदियों तक वे बिखरे रहे, लेकिन इस शताब्दी में परमेश्वर उन्हें फिर से उनके देश में लौटा रहा है।

 उसी प्रकार, कलीसिया भी कई सदियों से मसीह में अपनी आत्मिक विरासत से बाहर रही है। लेकिन अब परमेश्वर अपने लोगों को पुनर्स्थापित कर रहा है।पतरस ने प्रेरितों के काम 3:19–21 में कहा: “इसलिए मन फिराओ और फिरो कि तुम्हारे पाप मिटाए जाएँ, ताकि प्रभु की उपस्थिति से ताज़गी के दिन आएँ, और वह यीशु मसीह को भेजे जिसे पहले तुम्हें सुनाया गया था। स्वर्ग को उसे तब तक धारण करना है जब तक सब बातों की पुनर्स्थापना का समय जाए, जिसकी चर्चा परमेश्वर ने संसार के आरम्भ से अपने पवित्र भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा की है।

 2. यीशु के लौटने के लिए कलीसिया को तैयार करने की परमेश्वर की प्रक्रिया.  इस पद में मैं चार चरण देखता हूँचार अंग्रेज़ी शब्द जो RE से शुरू होते हैं:

1.     Repentance (पश्चाताप)

2.     Refreshing (ताज़गी / नवजीवन)

3.     Restoration (पुनर्स्थापना)

4.     Return (वापसी)

1. पश्चाताप

पहला शब्द है पश्चाताप
जब भी परमेश्वर के लोग उसकी इच्छा से भटक जाते हैं, तो आवश्यकता होती है पश्चाताप की।

पश्चाताप भावनाएँ नहीं हैयह एक निर्णय है।
इसका अर्थ है अपना मन बदलना।

इसका अर्थ है अपने लिए जीना छोड़कर कहना:

हे परमेश्वर, आप मुझे बताइए कि मुझे क्या करना चाहिए, और मैं वही करूँगा।

2. ताज़गी

पश्चाताप के बाद आता है ताज़गी का समय
जब हम पश्चाताप करते हैं तो आत्मिक जीवन में फिर से नई शक्ति और आनंद आता है।

3. पुनर्स्थापना

ताज़गी हमें पुनर्स्थापना की ओर ले जाती है।
परमेश्वर कलीसिया में खोई हुई बातों को फिर से लौटा रहा है।

4. वापसी

अंत में आती है यीशु की वापसी। क्रम इस प्रकार है: पश्चातापताज़गीपुनर्स्थापनावापसी मेरा विश्वास है कि हम अभी पुनर्स्थापना के समय में जी रहे हैं। परमेश्वर पुनर्स्थापित कर रहा है:

·        पवित्र आत्मा के वरदान

·        प्रेरितों, भविष्यद्वक्ताओं और सेवकाइयों को

·        सम्पूर्ण सुसमाचार के संदेश को

·        और सबसे महत्वपूर्ण कलीसिया की एकता को

3. एकता का अर्थ क्या है? एकता का अर्थ यह नहीं है कि पूरी दुनिया में केवल एक ही संगठन या संप्रदाय हो। यीशु ने यूहन्ना 17:20–23 में एकता को समझाया जब उसने प्रार्थना की: “कि वे सब एक हों, जैसे तू, हे पिता, मुझ में है और मैं तुझ में हूँ।पिता और पुत्र के बीच की एकता संगठनात्मक नहीं बल्कि संबंधात्मक है। यह एकता पवित्र आत्मा के द्वारा होती है। मसीही विश्वास मुख्य रूप से सही सिद्धांतों का धर्म नहीं है।


यह सही संबंधों का धर्म है:

1.     परमेश्वर के साथ सही संबंध

2.     विश्वासियों के साथ सही संबंध 

क्रूस स्वयं इस सत्य को दर्शाता है:

·        खड़ी लकड़ी = परमेश्वर के साथ संबंध

·        आड़ी लकड़ी = लोगों के साथ संबंध

यदि आड़ी लकड़ी टेढ़ी है, तो खड़ी लकड़ी सीधी नहीं हो सकती।
इसका अर्थ हैयदि हम अपने भाइयों के साथ गलत हैं, तो हम परमेश्वर के साथ भी सही नहीं हैं।

 

4. असहमति और विभाजन का कारण क्या है?  भाजन का मूल कारण धर्मशास्त्र नहीं है। प्रेरित पौलुस 1 कुरिन्थियों 3:1–4 में वास्तविक कारण बताता है: वह है शारीरिक स्वभाव (flesh / carnality)

इसके चिन्ह हैं:

·        ईर्ष्या

·        झगड़ा

·        विभाजन

·        मसीह के बजाय मानव नेताओं का अनुसरण करना

जब लोग कहते हैं: “मैं पौलुस का हूँ” “मैं अपुल्लोस का हूँतो वे शरीर के अनुसार चल रहे होते हैं। वास्तविक समस्या है स्वार्थी महत्वाकांक्षा। और इसका एक ही समाधान हैशरीर को क्रूस पर चढ़ाना। जैसा गलातियों 5:24 कहता है: “जो मसीह यीशु के हैं उन्होंने शरीर को उसकी वासनाओं और अभिलाषाओं सहित क्रूस पर चढ़ा दिया है।

5. संसार कैसे पहचानेगा कि हम यीशु के चेले हैं? यीशु ने यूहन्ना 13:34–35 में अपने चेलों की पहचान बताई: “यदि तुम एक दूसरे से प्रेम रखोगे, तो इसी से सब जानेंगे कि तुम मेरे चेले हो।प्रेम केवल सुझाव नहीं हैयह आज्ञा है। और जिस प्रेम की यीशु बात करता है वह बलिदानी प्रेम है। 1 यूहन्ना 3:16–17 में लिखा है:

हम प्रेम को इससे जानते हैं कि उसने हमारे लिए अपना प्राण दे दिया; और हमें भी भाइयों के लिए अपना प्राण देना चाहिए।यदि हमारे पास साधन होते हुए भी हम अपने ज़रूरतमंद भाइयों की सहायता नहीं करते, तो परमेश्वर का प्रेम वास्तव में हम में नहीं है। पौलुस ने मसीही शिक्षा के पूरे उद्देश्य को 1 तीमुथियुस 1:5 में इस प्रकार बताया: “हमारी शिक्षा का उद्देश्य यह है कि शुद्ध मन, अच्छे विवेक और निष्कपट विश्वास से प्रेम उत्पन्न हो।यदि सेवा प्रेम उत्पन्न नहीं करती, तो उसने अपने उद्देश्य को पूरा नहीं किया।

6. एकता कैसे पुनर्स्थापित होगी? एकता तीन स्रोतों के माध्यम से आएगी:

1. कलीसिया :- कलीसिया को उन मनोभावों से पश्चाताप करना होगा जो विभाजन उत्पन्न करते हैं।

2. परमेश्वर :- परमेश्वर अपने पवित्र आत्मा को सब प्राणियों पर उंडेलेगा, जैसा योएल में भविष्यद्वाणी की गई और प्रेरितों के काम 2 में उद्धृत किया गया। जितना अधिक पवित्र आत्मा कार्य करेगा, उतनी ही अधिक विश्वासियों के बीच की दीवारें गिरेंगी।

3. शैतान :- विडंबना यह है कि सताव (persecution) भी विश्वासियों को एक कर देगा। यीशु ने मत्ती 24 में कहा कि विश्वासियों को क्लेश सहना पड़ेगा। सताव के समय संप्रदायों के नाम महत्व खो देंगे। लोग केवल इस कारण से एक साथ खड़े होंगे कि वे यीशु के हैं। अंत समय में अंततः दो ही समूह होंगे:

·        मसीह की दुल्हन

·        झूठी कलीसिया (व्यभिचारिणी)

दुल्हन वह कलीसिया है जो यीशु के प्रति विश्वासयोग्य रहती है। हर विश्वास करने वाले को अंततः यह निर्णय लेना होगा: यीशु के प्रति निष्ठावानया विश्वासघाती। योएल इसे निर्णय की तराई कहता है। और उस तराई में हर व्यक्ति को चुनाव करना होगा।


प्र. रमेश सी. काउंडल
Eternal Hope Church

 

छाया से वास्तविकता तक

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