जब हम पूछते हैं कि क्यों परमेश्वर हमारी परीक्षा करता है या होने देता है कि हमारी परीक्षा हो, तो हम यह स्वीकार कर रहे हैं कि परीक्षा वास्तव में उस की ओर से ही आती है। जब परमेश्वर उसकी सन्तान की परीक्षा करता है, तो वह एक बहुमूल्य काम को करता है। दाऊद ने परमेश्वर के द्वारा परीक्षा किए जाने की मांग की, उसे अपने मन और हृदय की जाँच करने के लिए कहा और जाना कि वे उसके लिए सच्चे थे (भजन संहिता
26:2; 139:23)। जब इसहाक को बलिदान कर दिए जाने के विषय में अब्राहम की जाँच परमेश्वर के द्वारा हुई, तब अब्राहम ने आज्ञा मानी थी (इब्रानियों 11:17-19) और पूरे संसार को दिखाया कि वह विश्वासियों का पिता है (रोमियों 4:16)।
पुराने और नए दोनों नियमों में ही, "परीक्षा"
का अनुवाद करने वाले शब्दों का अर्थ "परीक्षा के द्वारा प्रमाणित होने से है" है। इसलिए, जब परमेश्वर उसकी सन्तान की परीक्षा करता है, तो उसका उद्देश्य यह प्रमाणित करना होता है कि हमारा विश्वास वास्तविक है। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर को यह सब स्वयं के लिए प्रमाणित करने की आवश्यकता है, क्योंकि वह सब कुछ जानता है, परन्तु वह हमें प्रमाणित कर रहा है कि हमारा विश्वास वास्तविक है, कि हम वास्तव में उसकी सन्तान हैं, और कोई भी परीक्षा हमारे विश्वास को उस से दूर नहीं करेगा।
बीज बोने वाले के दृष्टान्त में, यीशु उन लोगों की पहचान करता है जो हर्ष के साथ परमेश्वर के वचन के बीज को प्राप्त करते हैं, परन्तु जैसे ही परीक्षा का समय आता है, वे गिर जाते हैं। याकूब कहता है कि हमारे विश्वास की परीक्षा होने से धैर्य विकसित होता है, जो परमेश्वर के साथ चलने में सिद्धता की ओर ले जाता है (याकूब
1:3-4)। याकूब कहता है कि परीक्षा एक आशीष है, क्योंकि, जब परीक्षा समाप्त हो जाती है और हम "परीक्षा स्थिर रहते हैं," तो हम "जीवन का वह मुकुट पाएंगे जिसकी प्रतिज्ञा प्रभु ने उसके प्रेम करनेवालों से की है" (याकूब 1:12)। परीक्षा या जाँच हमारे स्वर्गीय पिता की ओर से आती है जो उन सभों के भले के लिए काम करता है जो उसे प्रेम करते हैं और जिन्हें परमेश्वर की सन्तान कहा जाता है (रोमियों 8:28)।
हम जाँच या परीक्षा में विभिन्न तरीकों से जाते हैं। एक मसीही विश्वासी बनने के लिए अक्सर हमें हमारे आराम के क्षेत्रों में से बाहर निकलने और अज्ञात् में जाने की आवश्यकता होती है। परीक्षा में धैर्य आत्मिक सिद्धता और पूर्णता के परिणाम को ले आता है। इसलिए ही याकूब ने लिखा है कि, "हे मेरे भाइयो, जब तुम नाना प्रकार की परीक्षाओं में पड़ो, तो इसको पूरे आनन्द की बात समझो"
(याकूब 1:2)। विश्वास की जाँच के लिए छोटे तरीकों और प्रतिदिन की चिड़चिड़ाहटपन के कारण आ सकती हैं; वे भी गम्भीर दुःख (यशायाह 48:10) और शैतान के आक्रमण (अय्यूब 2:7) हो सकते हैं। परीक्षा का जो कुछ भी स्रोत क्यों न हो, परीक्षाओं में से जाना हमारे लाभ के लिए है जिन्हें परमेश्वर हमारे ऊपर आने देता है।
अय्यूब का वृतान्त परमेश्वर का एक आदर्श उदाहरण है जिसमें परमेश्वर उसके सन्तों में से एक की परीक्षा शैतान के द्वारा करता है। अय्यूब ने अपनी सभी परीक्षाओं को धैर्यपूर्वक सहन किया और "इन सब बातों में भी... ने न तो पाप किया, और न परमेश्वर पर मूर्खता से दोष लगाया।" (अय्यूब 1:22)। यद्यपि, अय्यूब की परीक्षा का वृतान्त यह प्रमाण है कि शैतान के द्वारा हमारी परीक्षा किए जाने के प्रयास की क्षमता परमेश्वर की प्रभुता के नियन्त्रण के कारण सीमित है। परमेश्वर ने जो ठहराया है उससे परे कोई भी दुष्टात्मा हमारी परीक्षा नहीं कर सकता या दु:खी नहीं कर सकता है। हमारी सभी परीक्षाएँ परमेश्वर के पूर्ण उद्देश्य और हमारे लाभ के लिए ही काम करते हैं।
परीक्षा किए जाने के सकारात्मक परिणामों के कई उदाहरण पाए जाते हैं। भजनकार हमारी जाँच की तुलना चांदी के जैसे ताए जाने से करता है (भजन 66:10)। पतरस हमारे विश्वास को "सोने से अधिक कहीं अधिक बहुमूल्य"
के रूप में बोलता है, और यही कारण है कि हम "नाना प्रकार की परीक्षाओं के कारण दुःख" का सामना करते हैं (1 पतरस 1:6-7)। हमारे विश्वास की जाँच होने से, परमेश्वर हमें उन दृढ़ शिष्यों के रूप में बढ़ने का कारण बनता है जो रूप को देखकर नहीं अपितु वास्तव में विश्वास से जीते हैं (2 कुरिन्थियों 5:7)।
जब हम जीवन के तूफानों का अनुभव करते हैं, तो हमें उस वृक्ष की तरह होना चाहिए जो पृथ्वी पर एक मजबूत पकड़ के लिए अपनी जड़ों को और अधिक गहराई में ले जाता है। हमें परमेश्वर के वचन में और अधिक गहराई के पाने के लिए अपनी जड़ों को खोद देना चाहिए और उसकी प्रतिज्ञाओं से चिपके रहना चाहिए ताकि हम किसी भी तरह के तूफान के हमारे विरुद्ध आने पर खड़े रह सकें।
सबसे अधिक सांत्वना देने वाली बात यह है कि हम जानते हैं कि परमेश्वर कभी भी हमें हमारी सामर्थ्य से परे परीक्षा में नहीं डालेगा जिसे हम उसकी सामर्थ्य से सम्भालने में सक्षम न हों। उसका अनुग्रह ही हमारे लिए पर्याप्त है, और उसकी सामर्थ्य हमारी कमजोरियों में सिद्ध होती है (2 कुरिन्थियों 12:9)। पौलुस ने कहा, इस कारण मैं, "मसीह के लिये निर्बलताओं में, और निन्दाओं में, और दरिद्रता में, और उपद्रवों में, और संकटों में प्रसन्न हूँ; क्योंकि जब मैं निर्बल होता हूँ, तभी बलवन्त होता हूँ।" (2 कुरिन्थियों 12:10)।